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History

1842 : Bundelkhand Ki Asmita Ka Sangharsh

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Author: Rajgopal Singh Verma
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Paperback
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भारतीय स्वतन्त्रता संघर्ष के इतिहास में अनेक ऐसे महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं जिनके बारे में कम लोग जानते हैं। 1857 का विद्रोह तो सर्वज्ञात है किन्तु इसकी पृष्ठभूमि बुन्देलखण्ड में लगभग डेढ़ दशक पूर्व ही बन गयी थी यह लोगों को नहीं पता। इसे इतिहास में निजी कारणों से हुआ बुन्देला विद्रोह कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया। यह संघर्ष जनता की अस्मिता का संघर्ष था जिसे सभी आम और खास स्थानीय लोगों ने लड़ा। ललितपुर जिले के नारहाट से शुरू हुआ यह संघर्ष सागर, दमोह, नरसिंहपुर, छतरपुर, महोबा, हमीरपुर, ग्वालियर आदि जनपदों तक फैल गया था। इसमें बुन्देलों के साथ ही लोधी, गोण्ड जमींदारों तथा स्थानीय किसानों के अलावा सभी जाति-वर्ग के लोगों ने खुलकर भागीदारी की। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफसरों को अपनी जान के लाले पड़ गये, उन्हें बाहर से फौज मँगानी पड़ी, नये अफसरों को लाना पड़ा। इतिहास में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियाँ अनेक बार बनी हैं जब हम अपनों की दगाबाजी के चलते हारे हैं। इस संघर्ष में भी यही देखने को मिलता है कि कतिपय कारणों से हमारे लोग ही बिक गये और अँग्रेज सफल हो गये। उन्होंने ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति अपनायी और इसलिए यह आजादी की जंग अनेक बलिदानों एवं पुरजोर संघर्ष के बावजूद इच्छित परिणाम तक नहीं पहुँच पायी, लेकिन यह सच है कि इससे 1857 की नींव पड़ी जिसने बुन्देलखण्ड ही नहीं देश के बड़े भाग में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की चूलें हिला दी थीं। राजगोपाल सिंह वर्मा की यह पुस्तक बुन्देलखण्ड के जनसंघर्ष की प्रामाणिक गौरव गाथा है जो नयी पीढ़ी को इस उपेक्षित इतिहास से न सिर्फ रूबरू कराएगी बल्कि नये शोध के मार्ग भी प्रशस्त करेगी। यह सराहनीय है कि उनके द्वारा बुन्देलखण्ड के इस अनछुए संघर्ष को ऐतिहासिक दस्तावेजी सबूतों के साथ व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है। – प्रो. बहादुर सिंह परमार प्रोफेसर, महाराजा छत्रसाल वि.वि., छतरपुर
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