क़िस्सों की ख़ासियत यह होती है कि मारकीन के थान की तरह वे खुलते चले जाते हैं। उनकी हक़ीक़त सुनाने वाला ही जानता है। एक गप्पबाज़ दूसरे गप्पबाज़ की सनद देता है और क़िस्सों में इज़ाफ़ा होता जाता है। धनंजय चोपड़ा के पास पुराने गली-मोहल्लों के क़िस्सों की भरमार है, यह पुस्तक पढ़कर बख़ूबी पता चलता है। धनंजय ने ये क़िस्से तरंग में लिखे हैं। धनंजय को न कभी लिखने की उतावली रही न छपने की। ख़ालिस इलाहाबादी हैं, ख़रामा-ख़रामा जीने वाले। जीता रहे इलाहाबाद। यहाँ आबाद रहें क़िस्से-कहानियाँ।
—ममता कालिया, वरिष्ठ कथाकार
पूरी दुनिया में सबसे अलग तरह के कॉस्मोपॉलिटन कल्चर वाले हमारे इलाहाबाद शहर का हर क़िस्सा ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद करता हुआ मिलता है। ये क़िस्से हमें एक अलग ही ढंग का तेवर देते हैं, जिससे पूरी दुनिया में हमारी अलग और सबसे निराली पहचान बनती है। क़िस्सागो धनंजय चोपड़ा की इस पुस्तक में इलाहाबादी चबूतरेबाज़ी के जो क़िस्से शामिल हैं, उनकी बात ही कुछ और है। तय है कि इन क़िस्सों को पढ़ेंगे तो आपको हमारे शहर की अलमस्ती से प्यार हो जाएगा।
—तिग्मांशु धूलिया, फ़िल्म निर्देशक