तापस सेन की कीर्ति न सिर्फ़ एक श्रेष्ठ प्रकाश-व्यवस्थापक की है बल्कि वे प्रकाश-चिन्तक भी रहे हैं। उनके विशद अनुभवों को हिन्दी में लाना हिन्दी में रंगमंच सम्बन्धी वैचारिक सामग्री में एक मूल्यवान और ज़रूरी इज़ाफ़ा है। इस पुस्तक में रंगमंच की दुनिया के अनेक दुर्लभ प्रसंग और अनुभव दर्ज़ हैं। इन लेखों के माध्यम से पता चलता है किन-किन पड़ावों से गुज़रते हुए भारतीय रंगमंच का विकास हुआ। इस पुस्तक का अनुवाद बंग्ला से हिन्दी में सूर्यनाथ सिंह ने किया है।