बकरी’ का कॉण्ट्रिब्यूशन ये था कि जो भी गुस्सा कल्चरली रिफ्लेक्ट होता था… उसको पॉलिटिकल थीम लेकर एक नाटक बनाया… सर्वेश्वर जी ने। लेकिन गांधी का जो ट्रस्टीशिप था गांधियन थॉट जो फेल हो रहा था… उसपर भी तो प्रहार है ये नाटक… सर्वेश्वरदयाल सक्सेना खुद गांधी के विचारों को मानते थे… वे दरअसल नेहरू से नाराज थे… कुछ मुद्दों पर वे गांधी से नाराज़ हो सकते थे बिकॉज गांधी चूजेन नेहरू… नेहरू… हमें डेमोलिश करने की नहीं डीकंस्ट्रक्ट करने की ज़रूरत थी। बिकॉज नेहरू से आगे बढ़ने की ज़रूरत थी, उसको डेमोलिश करने की ज़रूरत नहीं थी। ये डेमोलिश प्रोसेस बाद में एण्टी काँग्रेसिज्म के रूप में आया, जिसमें राजनारायण आदि जुड़ गये… बाद में इस एक्सपेरिमेण्ट को सब जानते हैं। मैं ‘बकरी’ को बहुत आइडियालाइज नहीं करना चाहता। ‘बकरी’ की अपनी सीमाएँ हैं। इट्स अ पोलिटिकल सटायर, लेकिन तमाम राजनीतिक व्यंग्य में यह बहुत ही अच्छा राजनीतिक व्यंग्य है… क्योंकि सर्वेश्वर जी के पास सेंस ऑफ़ ह्यूमर है… इसलिए यह लम्बे समय तक सर्वाइव कर गया… लेकिन इसकी लिमिटेशन है। – इसी पुस्तक से