तीन बार यूपीएससी। तीन बार रिजेक्शन।
सोनू कुँवर बनारस लौटता है, बैसाखी पर। एक एडमिट कार्ड की लाश लिए। लौटते ही स्वागत में मिलता है एक करारा थप्पड़—DM की तरफ़ से।
यह कहानी बदले की है। यह कहानी हार न मानने की भी है। यह कहानी उस गैराज की है जहाँ—भगवान की एक फ़ोटो, एक जलता दीया और ‘WiFi है, मर्यादा में रहें’ का बोर्ड—तीन चीज़ें किसी की पूरी दुनिया सँभाले रखती हैं। यह कहानी तुलसी टी-स्टॉल की भी है, जहाँ डेढ़ बैटरी, मंटू दीवाना और छोटू छलिया हर शाम बनारस को अपनी अदालत में पेश करते हैं, बिना जज बने। यह कहानी सांड बनारसी की भी है, जो ख़ुद बादशाह है, जिसके यहाँ स्टीव जॉब्स से लेकर दाऊद इब्राहिम तक सलाह माँगने आए थे।
सोनू सोचता है, वह बदला लेगा। बनारस सोचता है कुछ और; क्योंकि यहाँ मुग़ल आए और गए, अँग्रेज़ आए और गए, स्मार्ट सिटी आई और अटक गई, पर बनारस वही रहा। यह शहर किसी के हिसाब से झुकता नहीं। यह ख़ुद एक समीकरण है, जिसे कोई हल नहीं कर पाया, क्योंकि यहाँ हर गुंडागर्दी से बड़ी एक गुंडागर्दी है—ख़ुद बनारस की।