‘बंजर’ नामक इस उपन्यास के केन्द्र में है अकाल। अच्छा-खासा गाँव इक्कीसवीं सदी में निर्धन होते-होते आखिरी साँस लेते हुए दिखाई देता है, इसी वास्तविकता का चित्रण रवीन्द्र शोभणे इस उपन्यास में करते हैं। गाँव-कस्बा इस कहानी का केन्द्र है। गाँव-कस्बे से ही मृत्यु और जीवन के बीच खड़ी इंसानियत का विराट दर्शन होता है यही सत्य ‘बंजर’ का प्राण है। इक्कीसवीं सदी के शुरू में ही वैश्वीकरण, मुक्त अर्थव्यवस्था का दशावतारी अनुभव कृषि व्यवस्था को होने लगता है। परिणामस्वरूप ग्लोबलाइजेशन के कारण गाँव-कस्बे का जन-जीवन विनाश की ओर झुकने लगता है। कृषि व्यवस्था का खून चूसने वाला, उसे निष्प्रभ करने वाला वास्तव चारों ओर दिखाई देता है। उपजाऊ जमीन की सर्जनशीलता का अन्त होने लगता है। प्राकृतिक मुसीबतों की कतार निर्दयी बनकर कृषिजनों के जीवन को तितर-बितर कर देती है। पाठकों को इस उपन्यास के माध्यम से गहरा जीवनानुभव लेखक देते हैं। इक्कीसवीं सदी के शुरू में ही कृषि व्यवस्था का यह जानलेवा अनुभव, निःशब्द कर देने वाला वर्णन मराठी उपन्यासों में पहली बार होता है, यह इस उपन्यास की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। रवीन्द्र शोभणे जैसे सशक्त उपन्यासकार इन अनुभवों का चित्रण करते हुए गाँव-कस्बे को जीवन्त रूप देते हैं। और यह रूप देते हुए वह अपनी भूमि का हिस्सा बनकर प्रस्तुत उपन्यास को उजागर करते हैं। और यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी है।