भारतेन्दु ने नाटककार, निर्देशक, अभिनेता और रंगमण्डलियों के संगठनकर्ता के रूप में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है, उसने हिन्दी के शौक्रिया रंगमंच की एक स्वस्थ परम्परा बनायी है। उन्होंने गुलामी के माहौल में अपने समय की व्यंजना के साथ जनता को जागरूक करने के प्रयास में नाटक लेखन और प्रदर्शन का जो रूप प्रस्तुत किया है, वह आज भी प्रासंगिक है। इसी के साथ वे रंगकर्मियों के लिए रंगसिद्धान्तों का निर्माण भी करते रहे। इन्हीं विशिष्टताओं के कारण उन्हें युगनिर्माता कहा जाता है। पुस्तक में संकलित सभी लेख इसी को रेखांकित करते हैं।