इंसानी जीवन कितना क्षणभंगुर है, इसे देखना हो तो किसी अस्पताल में जाकर कुछ दिन ठहर जाइए। नामालूम क़िस्म की अनगिनत बीमारियाँ वहाँ जीवन को छीनने के लिए मुँह बाए खड़ी दिख जाएँगी। लेकिन इसी बीच कोई मरीज़ कुछ दिन बाद बीमारी को हराकर बेड से उठ खड़ा होता है और यह बता देता है कि जीवन बहुत बड़ा है, बस उसके लिए लड़ना आना चाहिए। अनीता कथूरिया का उपन्यास ‘भीगे पंखों की उड़ान’ की कहानी गंभीर बीमारी से लड़ते हुए जीवन की क्षणभंगुरता के साथ ही उसकी जीवटता को समझने की कहानी है। कैंसर जैसी किसी बीमारी से लड़ रहीं मायादेवी जिस तरह मौत से जंग लड़ती हैं और जीत भी जाती हैं, उनकी जीवटता और जिजीविषा ही इस उपन्यास का हासिल है।