जिन्हें क़िस्से-कहानियों का चाव है, ये किताब उनके लिए है! मध्यभारत के ग्राम-अंचल और जनपद की इन कहानियों में एक निम्न मध्यवर्गीय जीवन के ब्योरे साकार हुए हैं! साहित्य में बांग्ला, पुरबिया और गंगातीरी अंचल के जितने कथादेश सम्भव हुए हैं, उतना स्थान जाने किन कारणों से मध्यप्रांत को नहीं मिला है। और मालवांचल का जीवन तो साहित्य की मुख्यधारा से लगभग पूरी तरह से ओझल है। इसलिए भी मालवा की बोली-बानी से सजी ये कहानियाँ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए हमें संतोष हो रहा है। पुस्तक की भाषा सरल, मुहावरेदार और टकसाली है! परिवेश निम्न मध्यवर्गीय और भावबोध जनपदीय है। कुछ कहानियाँ आर्थिक उदारीकरण से पहले वाले भारत की हैं तो कुछ उस पुरानी दुनिया की झलक देने वालीं, जिसकी आभासी यथार्थ के साथ अंतःक्रिया अभी आरम्भ ही हुई थी। लेखक के जीवन की यह रामकहानी अब पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है !