कटे हुए पंखों वाली एक परी हो तुम।" उसने लिखा था। हर रोज ऐसी ही कुछ-न-कुछ कविता लिखकर वह भेजता था, ठीक उसी तरह जैसे कोई अठारह-उन्नीस साल का एक नवयुवक अपनी स्कर्ट पहनने वाली प्रेमिका को लिख रहा हो। उसने अपने ई-मेल में लिखा था, "कटे हुए पंखों वाली एक परी हो तुम। तुम्हारे प्यारे-प्यारे उन पंखों को किसी ने अपने पास रख लिया है। अगर वे पंख तुम्हें कोई लौटा देता, तो क्या तुम मेरे पास होती?" भले ही, कूकी एक कवयित्री नहीं थी, जैसे वह भी कोई कवि नहीं था; फिर भी उसका हर ई-मेल कविताओं से परिपूर्ण होने के साथ-साथ एक नएपन का आभास देता था। कविता लिखते-लिखते कभी वह अचानक से गद्य-जगत में प्रवेश कर जाता था तो कभी कभी गद्य लिखते लिखते अचानक से काव्य-जगत में कविता की धारा बनकर बहने लग जाता था। धीरे-धीरे कर उसने कूकी के दिल में अपनी जगह बना ली थी। लेकिन कूकी को अजीब-सा लग रहा था, कि जिस आदमी ने उसे कभी भी नहीं देखा, वह आदमी अपने दिल में एक गहरी तड़प लिए उसे इतना प्यार कैसे कर सकता है? अपनी जिज्ञासा का समाधान न पाकर उसने एक दिन इस बात को उससे पूछा भी था।