उर्दू शाइ’री ही नहीं दुनिया की सभी ज़बानों के अदब में चराग़ से चराग़ जलाने की रिवायत पायी जाती है। जिस तरह लफ़्ज़ से लफ़्ज़ बनते हैं, मा’नी से मा’नी निकलते हैं बिल्कुल इसी तरह शे’र से शे’र बनते हैं। उर्दू शाइ’री में उस्ताद शायरों की ज़मीनो में ग़ज़लें कहने की रिवायत रही है। ये रिवायत फ़ारसी से सीधे दकनी ग़ज़ल में आई जो आज की उर्दू ग़ज़ल में भी प्रचलित है। इस किताब में उस्ताद शायरों की ज़मीनों में उनकी अगली नस्ल के शायरों की कही गईं ग़ज़लें संकलित की गई हैं।