शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की कविताओं में लोक कभी अतीत की सुरक्षित शरणस्थली नहीं रहा आया है। उनकी दृष्टि अपने पहले कविता-संग्रह ‘सावन सुआ उपास’ के बाद अपनी कविताओं की इस दूसरी किताब में अधिक विस्तृत हो ऐतिहासिक और दार्शनिक भूगोल में प्रवेश करती दिखाई देती है। गाँव, श्रम, ऋतु, स्मृति और विस्थापन के अनुभवों से निर्मित जो काव्य-दृष्टि शैलेन्द्र के यहाँ केंद्रीय रही आई है, उसका एक नवीन परिप्रेक्ष्य इस ताज़ा संग्रह की कविताओं में मिलेगा। इतिहास और वर्तमान का तनाव इन कविताओं में और ज़्यादा मुखर हुआ है। यहाँ इस संग्रह के शीर्षक 'चुपचाप' में समाई व्यंजना को समझा जा सकता है। यह शैली लोकप्रियतावाद, जाति, संस्कृतिकरण और बाज़ार की भाषा को एक साथ टटोलती है तथा निश्चय ही शैलेन्द्र कुमार शुक्ल की कविता को अपने समय की एक विशिष्ट और विश्वसनीय आवाज़ बनाती है।