धर्मवीर भारती संसार के प्रमुखतम नाटककारों में से एक हैं, विरलतम हैं। यदि संख्या की दृष्टि से देखें तो भारती जी ने लघु नाटक लिखे- नदी प्यासी थी, नीली झील, सृष्टि का आखिरी आदमी आदि। उन्होंने एक ही वृहद नाटक लिखा-‘अन्धा युग’। यह नाटक ही नहीं महाकाव्य है, उनकी सैकड़ों रचनाएँ इस पर न्योछावर !! कई वर्षों से भारतीय साहित्य में ‘अन्धा युग’ की बराबरी का कोई नाटक लिखा ही नहीं गया है। विख्यात नाटककार गिरीश कारनाड का भी यह मानना है कि शूद्रक के बाद अगर सबसे प्रमुख नाटक लिखा गया है तो वह’ अन्धा युग’ है। ‘अन्धा युग’ महाभारत के उत्तरार्द्ध की घटनाओं पर आधारित है लेकिन दो विश्वयुद्धों की विकरालता और उपनिवेशवाद से मुक्ति के साथ जो राष्ट्र उदित हो रहा था उस सदी की और वर्तमान सदी की विकृतियों की झंकृति इसमें मिलती है। प्रत्येक रचनाकार का ये जैविक अधिकार है कि वह अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों से वस्तु या पात्र ग्रहण करे लेकिन वह उस कथा को कैसे कहता है? क्या कहता है? यह महत्त्वपूर्ण है। सार्वजनीन होने के लिए आवश्यक है कथा सार्वजनीन हो। महाभारत की कथा हमारी लोक-स्मृति में रची-बसी है। उससे हम परिचित हैं। परिचय की इस निकटता से संवाद स्थापित होता है और बात आगे बढ़ती है। यह पीछे जाना आगे जाने की ही प्रक्रिया है। – इसी पुस्तक से