भारत ने अपनी आजादी के 75 सालों में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। अपनी सभ्यतागत अवधारणाओं के साथ विश्व परिदृश्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज की है। अनेक क्षेत्रों में हमारी उपलब्धि काबिलेगौर है तो पर्यावरण प्रकल्पों पर हमारी गति धीमी है। उनमें से एक मसला है प्रकृति के साथ मानवीय सम्बन्ध में आए आमूलचूल परिवर्तन का। हालाँकि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, पानी का संकट, जैव-विविधता में कमी, मिट्टी का क्षय, महासागरों का प्रदूषण, कचरों का निस्तारण, जैसी समस्याएँ विकराल होती जा रही हैं, और भारत भी इन सबसे अछूता नहीं है। इनमें से अनेक समस्याएँ विकसित देशों द्वारा प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन करने का नतीजा हैं, जो बाकी देशों में विकास योजना का आधार बन गया है। भारत जैसा देश जो मानव सभ्यता का प्राचीनतम केन्द्र रहा है और उसका इतिहास प्रकृति के साथ परम्परागत रूप में सामंजस्य का एक समृद्ध दस्तावेज है, चाहे खेती का तरीका हो, खानपान की आदतें हों, पानी का प्रबन्धन हो, नदियों के साथ सामंजस्य हो, शहर निर्माण हो, गाँव की विकेन्द्रित अर्थ-व्यवस्था या फिर जंगल और जमीन से जुड़ी मान्यताएँ हों हर पहलू में पर्यावरण और प्रकृति के साथ सटीक तालमेल की जरूरत को समझा जा सकता है। इस पुस्तक में पर्यावरण से जुड़े संकटों को समझने की कोशिश की गयी है, और वर्तमान पर्यावरणीय द्वन्द्वों के विश्लेषण के लिए एक आवश्यक अन्तर्दृष्टि भी मिलती है।