1919 - जलियांवाला बाग, अमृतसर के नरसंहार में 300 लोग मारे गये !
1913 - राजस्थान के बांसवाड़ा ज़िले के मानगढ़ पहाड़ पर हुए नरसंहार में 1500 आदिवासी मारे गये !
जलियांवाला बाग से 6 वर्ष पहले हुआ राजस्थान का यह नरसंहार !
जलियांवाला बाग से कई गुणा भीषण !!
1913 में अंग्रेज़ों का राज था। राजस्थान-गुजरात की सीमा पर बांसवाड़ा आदिवासियों का गढ़ था। अंग्रेज़ शासक आदिवासियों का शोषण करते और उनसे नाजायज़ कर वसूलते। अंग्रेज़ों के अन्याय के खिलाफ वहाँ के समाज सुधारक गोविन्द गुरु ने आदिवासियों को संगठित करने के लिए 1883 में संप सभा की स्थापना की। 17 नवम्बर 1913 को बड़ी संख्या में मानगढ़ की पहाड़ी पर संप सभा के आदिवासी शांतिपूर्वक इकट्ठा हुए। शांतिपूर्ण सभा में बैठे इन निहत्थे आदिवासियों पर अंग्रेज़ों और स्थानीय राजाओं की सेनाओं ने अचानक अंधाधुंध गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं... और मानगढ़ की पहाड़ी आदिवासियों के खून से लाल हो गई।
आदिवासी भीषण नरसंहार के 89 वर्ष बाद 2002 में इस शहादत के स्थान पर पहाड़ी के ऊपर एक शहीद स्मारक बनाया गया है। स्थानीय पत्थर से बना यह भव्य, ऊँचा स्मारक आदिवासियों के शौर्य, स्वाभिमान और बलिदान का प्रतीक है।
2008 में हरिराम मीणा ने गहन शोध के बाद इस खूनी आदिवासी नरसंहार पर "धूणी तपे तीर" उपन्यास लिखा, जो अब 2026 में नयी साज-सज्जा के साथ पुनःप्रकाशित है। हरिराम मीणा एक प्रतिष्ठित लेखक और बुद्धिजीवी हैं जिनका आदिवासी समाज के प्रति गहरा सरोकार है।