शकील जमाली की ग़ज़लों में एक ख़ास तरह की ताज़गी है। शेर कहने का अन्दाज़ उनका अपना है और ज़बान भी उनकी अपनी है, जो अमूमन गुफ़्तुगू में होती है। ख़ासतौर से छोटी बहरों में उनका तख़लीक़ी जौहर देखते ही बनता है। शकील जमाली आम जीवन के छोटे-छोटे दुख-सुख और अपने समाज की छोटी-बड़ी ख़राबियों से शेर बुनते हैं। कुछ ऐसे सहज अन्दाज़ में, मासूमियत का लहजा इख़्तियार करते हुए कि उनकी बात में कसक, दिलकशी और लज़्ज़त पैदा हो जाती है। उन्होंने अपनी शायरी के हवाले से एक मुनफ़रिद मुक़ाम बनाया है। वो बहुत सादा, सलीस और शगुफ़्ता ज़बान में शायरी करते हैं। सलासत और रवानी उनके कलाम का ख़ास्सा है। वो इतनी मासूमियत से बातों-बातों में शेर कह जाते हैं कि सुनने और पढ़ने वाले सहर-ज़दा हो जाते हैं।