क्लासिक रचनाओं पर हम बातें खूब करते हैं लेकिन पढ़ते बहुत कम हैं । इन रचनाओं को बीते जमाने की चीज़ मानकर इन्हें अपने पुस्तकालय और ड्राइंग रूम सजाने की वस्तु बना देते हैं। विमर्शों के समय में हिन्दी क्लासिक उपन्यासों को पुनः पढ़ने पर उनके नए पाठों की संभावनाएं बनी रहती हैं, जो इन उपन्यासों की प्रासंगिकता के प्रश्न पर नए सिरे से विचार के लिए आमंत्रित करती हैं। इस पुस्तक (दिगंबरा) ने क्लासिक उपन्यासों को ड्राइंग रूम के सजावटी सामान से बाहर निकलकर विमर्शों के बीच लाकर इनके दबे-ढके पाठों को खोला है। ये पाठ इन क्लासिक उपन्यासों को नई अर्थवत्ता प्रदान करते हैं।