लाहौर से दिल्ली पहुँचने में कितना वक़्त लगता है—कुछ घंटे, या कभी-कभी पूरी उम्र?
एक बुज़ुर्ग रोज़ इस सफ़र का हिसाब लगाता है। परदेस में नौकरी तलाशते दो अनजान नौजवान एक-दूसरे की मूख पहचान लेते हैं। एक बेटी अपने पिता के फेंके हुए काग़ज़ों में उनका अनकहा प्यार सँभालती है। अपने घरों और समाज में जगह तलाशती स्त्रियाँ पूछती हैं कि उनकी सुरक्षा, इच्छा और आज़ादी का फ़ैसला आख़िर कौन करेगा।
‘दिल्ली पहुँचने में कितना वक़्त लगता है’ समकालीन पाकिस्तानी कथाकारों की बीस कहानियों का संग्रह है। इनमें बँटवारे की स्मृतियाँ हैं, रोज़ी-रोटी की जद्दोजहद है, प्रेम की कसक है और धर्म तथा रिवाज की आड़ में पलती हिंसा से टकराते जीवन हैं। यथार्थ, व्यंग्य, फ़ंतासी और प्रतीकों के अलग-अलग रास्तों से ये कहानियाँ मनुष्य की असुरक्षा और उसके भीतर बची करुणा तक पहुँचती हैं।
अविनाश अमन के चयन और हिंदी अनुवाद में सामने आती ये आवाज़ें हमें पड़ोसी मुल्क के उन घरों, गलियों और दिलों में ले जाती हैं जहाँ बहुत कुछ अपरिचित होकर भी अपना लगता है। पढ़ते हुए किसी किरदार के दुख में अपना दुख पहचान लेना शायद सरहद पार करने का सबसे आत्मीय तरीक़ा है।