हरियश राय का यह उपन्यास एक ऐसी स्त्री की कथा कहता है जो हिमाचल के छोटे से गाँव से निकलकर मैनेजमेण्ट की डिग्री हासिल करती है और कॉरपोरेट जगत में नौकरी करती हुई अपने जीवन की राह खुद तलाश करती है। वह अपने परिवार में गरिमापूर्ण सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा करती हुई, इसे पाने की खातिर हर लड़ाई लड़ने के लिए अपने आप को तैयार करती है और अपने आप को एक ऐसे मुकाम पर ले जाती है जहाँ उसे सुकून मिलता है और वह सुकून उसके लिए जीवन की हर खुशी से बड़ा बन जाता है। उपन्यास की नायिका दूर्वा एक तरफ तो अपने परिवार से अपने वजूद की लड़ाई लड़ती है और दूसरी ओर अपने गृहप्रदेश के पहाड़ों को विनाश से बचाने की कोशिश करती है। वह पुरुषप्रधान समाज की रूढ़ियों और पहाड़ों में चल रही विनाशलीला दोनों से एकसाथ जूझती है। पिछले कुछ समय से पहाड़ों के साथ जो हो रहा है वह काफी भयावह है। यह उपन्यास उस भयावह परिवेश की एक तस्वीर हमारे सामने रखता है। दूर्वा विकास के नाम पर काटे गये पेड़ों, सूखी हुई बावड़ियों, तबाह हुए चश्मों को लेकर आहत है। वह कुछ ऐसा करना चाहती है जिससे पहाड़ों का जीवन भी बचा रहे और विकास की नयी राह भी खुले। इस उपन्यास में हिमाचल में किसानों की जमीनों को अधिग्रहित करने के बाद के सन्दर्भ, उन सन्दर्भों से बना परिवेश, लोगों का जीवन और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने की उनकी इच्छाशक्ति के निशान मौजूद हैं। यह उपन्यास पहाड़ों की तबाही को सामने रखते हुए एक ऐसे परिवेश के निर्माण की कल्पना है जहाँ विकास भी हो और लोगों के जीवन की गरिमा भी बनी र