नीलिम कुमार असमिया भाषा के प्रतिष्ठित कवि हैं। उन्होंने गद्य बहुत नहीं लिखा है। लेकिन उनका यह आत्मकथात्मक उपन्यास कई अर्थों में विलक्षण है। पूरे उपन्यास में मानो करुणा के तार स्पन्दित होते रहते हैं। असम के एक छोटे-से कस्बे में रहते बड़े से परिवार के सदस्य कैसी कैसी खुशियों और साथ ही हिंसा और अवहेलना से गुजरते हैं, इसका बेहद संवेदनशील लेखा-जोखा इस उपन्यास में है। लगभग चार पीढ़ियों को सम्हाले इस परिवार का अपना वैभव है और अपनी विपन्नताएँ हैं। इसमें बुजुर्ग भी हैं, बच्चे भी, वयस्क भी हैं, कैंसर से पीड़ित आख्याता की माँ भी। इन सबको जोड़ता हुआ इस परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्य की ममता और दायित्व का धागा। इस उपन्यास में नीलिम ने पूरी निर्ममता से इस परिवार के हर सदस्य को जीवन्त करने का एक ऐसा प्रयास किया है जो आत्मकथात्मक उपन्यासों में बहुत कम देखने में आता है। असम के ग्रामीण अंचल को अपने में समाये यह कृति देहात की खूबसूरती और सीमाओं दोनों को भरपूर करुणा से चित्रित करती है। यह जीवन के सहज बहाव का उपन्यास है, मन्थर गति से बहता जीवन जिसमें हलके हलके कुछ बदलाव आते हैं, कोई रिश्तेदार आकर इस प्रवाह में शामिल हो जाता है, कोई न चाहकर भी पीछे कहीं छूट जाता है लेकिन सभी लोग समय की सिलवटें निरन्तर बने रहते हैं। यहाँ जीवन की तरह ही न कोई ‘क्लाइमेक्स’ है, न किसी तरह की नाटकीयता। पर यह तथ्य कभी भी आँखों से ओझल नहीं हो पाता कि यह बहता हुआ जीवन, यह धूल के परदे में उभरते विलुप्त होते चरित्र, यह अस्पताल में कैंसर की बीमारी और परिवार से बिछोह का दुख सहती स्त्री-पात्र कवि की आँखों से देखे गये, कवि के कानों सुने गये जीवन का प्रवाह है जिसमें दुख भी पाठक के अन्तस को आन्दोलित करते हैं, सुख भी। मुझे शक नहीं कि जब पाठक इस उपन्यास को पढ़कर इससे बाहर आएगा, वह कहीं अधिक समृद्ध होगा, कहीं अधिक संवेदनशील। – उदयन वाजपेयी