इस किताब की ग्यारह कहानियों में प्रशासन है, स्त्रियाँ हैं, सरकारी दफ़्तर हैं, रिश्ते हैं, सपने हैं, शिकायतें हैं और वे तमाम छोटी-बड़ी मूर्खताएँ हैं जिनके बिना शायद हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी चल ही नहीं सकती। इन कहानियों की स्त्रियाँ भी बहुत समझदार होने का दावा नहीं करतीं। वे ग़लतियाँ करती हैं, उलझती हैं, सवाल पूछती हैं, अपनी बात पर अड़ती हैं और कई बार वहाँ हँस देती हैं जहाँ गंभीर बने रहना ज़्यादा उचित माना जाता है।
इन कहानियों में किसी समस्या का समाधान नहीं है। इनमें महज़ सवाल हैं, शिकायतें हैं और कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिन्हें देखकर हँसी आती है। फिर थोड़ी देर बाद लगता है कि जिस बात पर हँसे थे, वह शायद इतनी मज़ेदार थी भी नहीं। इन्हें पढ़ते हुए जीवन और व्यंग्य के बीच फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है। कई बार जो घटनाएँ बिल्कुल वास्तविक हैं, वे दोबारा पढ़ने पर किसी व्यंग्य-कथा जैसी लगने लगती हैं और जो पूरी तरह काल्पनिक हैं, वे किसी सरकारी बैठक की कार्यवाही से कम वास्तविक नहीं लगतीं।
ये कहानियाँ दुनिया को समझने की कोशिश हैं। इनमें से कुछ बातें आपको हँसाएँगी, कुछ चिढ़ाएँगी और कुछ शायद ऐसी होंगी जिन्हें पढ़कर आप कहेंगे—यह तो हमारे साथ भी होता है।