प्रख्यात कहानीकार जयनंदन जहाँ अपने कथ्य की प्रखरता के लिए जाने जाते हैं वहीं शिल्पगत वैविध्य और सधाव के लिए भी। उनके नये कहानी संग्रह गमेती बेसरा की मौरूसी जमीन में उनकी यह खूबी और भी शिद्दत से उभरकर आती है। एक ऐसे दौर में, जब अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे बढ़ रहे हैं, और यही नहीं, इस खतरे का मुकाबला करने के बजाय, कन्नी काटने में ही समझदारी मानी जा रही है, जयनंदन बेहिचक अभिव्यक्ति के जोखिम उठाते हैं। उनकी कहानियाँ अबूझ इशारों में नहीं, बल्कि बड़ी मुखरता से और गहरे आवेग के साथ, इस दौर के अन्याय, अत्याचार, लूट, असहिष्णुता, दमन, दुष्प्रचार और पाखण्ड का प्रतिरोध रचती हैं। इनकी कहानियों में सरोकारों के साथ हैं सरोकार यहाँ सतह पर नहीं है वह रचना अनुस्यूत सन्दर्भ है। इनकी चिन्ताएँ ऊपर से या बाहर से पिरोयी हुई नहीं हैं बल्कि रचना का उत्स हैं, और तज्जनित प्रवाह भी, उनकी रचनाशीलता का कारण भी और कार्य भी। इस संग्रह की कहानियों में हमारे समय का हाहाकार दर्ज है, गाँव से लेकर शहर तक, जंगल से लेकर महानगर तक बचाओ बचाओ की गुहार सुन पड़ती है। इन्हें पढ़ते हुए चतुर्दिक संकट से घिरे होने का अहसास हम पर तारी हो जाता है। इसलिए स्वाभाविक ही ये कहानियाँ हमें विचलित करती हैं। कहना न होगा कि रचनाकार की मंशा भी यही रही होगी कि समाज को दिनोदिन और भी संवेदनहीन, और भी हिंसक, और भी मूढ़, और भी पाखण्डप्रिय तथा और भी प्रतिगामी बनाने के संगठित षड्यन्त्रों को हम पहचानें और इस सब के प्रति सजग हों।