चुनाव की भविष्यवाणी, आन्दोलन की कहानी या फिर सरकार और किसानी जैसे सरोकारों से अलग यह किताब योगेन्द्र यादव की गहरी विचार यात्रा का हमसफर बनाती है। इस यात्रा का प्रस्थान बिन्दु है यह प्रश्न कि भारत गणराज्य का स्वधर्म क्या है? जवाब की तलाश भारतवर्ष, हिन्दुस्तान और इण्डिया के त्रिवेणी संगम की ओर ले जाती है जहाँ गणराज्य के स्वधर्म के चार सूत्र मिलते हैं। रास्ते में लेखक की भेंट एक धर्म, एक संस्कृति, एक भाषा वाले राष्ट्रवाद से होती है जो यूरोप के राष्ट्र-राज्य की नकल है। यहाँ से लेखक भारतीय राष्ट्रवाद की भुला दी गयी विरासत की खोज और आज के सन्दर्भों में एक सकारात्मक राष्ट्रवाद की चुनौतियों से मुकाबले की राह पर निकल पड़ता है। इस सफर में साम्प्रदायिकता का देश-विरोधी चेहरा उजागर होता है तो सेकुलर राजनीति का पाखण्ड भी। भारतीय संस्कृति के नाम पर राजनीति की दुकान दीखती है तो आधुनिकता के नाम पर मानसिक गुलामी भी। कश्मीर, असम और मणिपुर में पड़ाव डालती हुई यह यात्रा सीमापार भी झाँकती है। इस यात्रा का मुख्य सबक है कि राष्ट्र, धर्म और सांस्कृतिक विरासत के प्रति लापरवाही के घटाटोप में आज भारतीयता के नाम पर भारत के स्वधर्म को नष्ट किया जा रहा है। इस स्वधर्म की रक्षा करना हमारी सभ्यता का तकाजा है। और हमारे समय में देशधर्मी राजनीति का लक्ष्य। ऐसी राजनीति का नक्शा पकड़ाने के बजाय अन्त में यह यात्रा स्वराज के अष्टांग मार्ग की ओर इशारा करती है। ताकि यह विचार यात्रा जारी रहे। एक संवेदनशील नागरिक की उत्कट वेदना, एक चिन्तक और अध्येता की समझ और एक कार्यकर्ता के आत्म-मन्थन से बनी यह किताब हमें भविष्य की राजनीति के लिए एक नयी भाषा गढ़ने को प्रेरित और आमन्त्रित करती है।