यह सपना ही था बेटा, जिसे हमारे धर्म-पिता मिहिर लाल ने देखा था। उनकी कोई सन्तान नहीं थी। उन्हें विरासत में अकूत सम्पत्ति मिल गयी थी। उनके पिता ने सिखाया था कि जीवन में सबसे बड़ा पुण्य और पूजा है यतीमों और दीन-दुखियों को अपनी समृद्धि में हिस्सेदार बनाना। जिन अभागों के लिए दुनिया में सिर्फ दुत्कार, फटकार और अन्धकार है, उनके लिए थोड़ा सा प्यार, अवसर और रौशनी ढूँढ़ने की कोशिश करना। उन्होंने एक संस्था बना ली थी ‘विटप’ यानी छतनार छायादार वृक्ष। मिहिर दादू ने दर्जनों दीन-दुखी बच्चों को ऊँची तालीम दिलायी। आज वे बच्चे बड़ी-बड़ी नौकरियों में हैं और बिना माँगे हर महीने अपनी कमाई का एक अंश माई के खाते में डाल देते हैं। मिहिर बाबूजी सप्ताह में कभी दो दिन, कभी तीन दिन सौ-सवा सौ भूखों को नियमित भोजन कराते रहे। दुनिया से विदा होते हुए उन्होंने यही कहा था कि यह क्रम जारी रहना चाहिए। माई ने उनकी इच्छा को और भी बड़ा आकार दे दिया। उन्होंने तय किया कि समय-समय पर आठ-दस बेसहारे लड़कों को लाकर उन्हें अच्छा जीवन दिया जाए। – इसी पुस्तक से