हाल में विश्व भर में पर्यावरण विषय पर खूब चर्चा होती दिखाई देती है। वैश्विक स्तर पर पर्यावरण रक्षण के लिए प्रयास भी होते दीखते हैं। पर्यावरण में बदलाव का पृथ्वी तथा मानव जीवन पर होने वाले गम्भीर परिणामों की चर्चा की जाती है। हवा, पानी, वायु जिस पर सजीवों का जीवन अवलम्बित है, वो घटक प्रदूषित हो गये हैं। प्रदूषण इतना बढ़ा है कि सारा विश्व उसकी चिन्ता कर रहा है। लेकिन किसी से भी यह प्रदूषण रोका नहीं जाता। प्रगति और प्रदूषण एक ही सिक्के के दो पहलू हो गये हैं। शुद्ध हवा, शुद्ध जल, शुद्ध अन्न, ये केवल कल्पना बनकर रह गयी है। प्रदूषण के कारण वैश्विक स्वास्थ्य खतरे में आ गया है, लेकिन इस पर व्यक्ति, समाज या राष्ट्र गम्भीरता से सोचते दिखाई नहीं देते। मुकुल शर्मा की किताब हरी नीली धरती के प्रकाशन का समय पर्यावरण की दृष्टि से अत्यन्त भयावह और डरावना है। मुकुल शर्मा जाति से ब्राह्मण हैं, फिर भी दलित पर्यावरण का विचार करते हुए दीखते हैं। दलितों ने भी इस विषय को लेकर गम्भीरता से विचार किया है, ऐसा दीखता नहीं। दलित पर्यावरण के अध्ययन तथा शोध पर मुकुल शर्मा ने ध्यान आकर्षित किया है। मुकुल शर्मा ने इस विषय में खूब अध्ययन किया है। उनकी मेहनत उनके अध्ययन से दिखाई देती है। यह साहित्य की ओर देखने की एक नयी दृष्टि है, उन्होंने अपने लेखन में पर्यावरण की जिस प्रकार चिन्ता की है वैसे ही समस्त उपेक्षित वर्ग के सांस्कृतिक शोषण के विरुद्ध भी अपनी मान्यता रखी है। इसलिए इस ग्रन्थ का महत्त्व और अधिक बड़ा है। मुझे आशा है कि आने वाले समय में मुकुल शर्मा का इस क्षेत्र पर अधिकार सबकी प्रशंसा का विषय होगा। – शरणकुमार लिम्बाले