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Literary Criticism/Women-Studies/History

Hindi Sahitya Ke 75 Varsh : Nehru Yug Se Modi Yug Tak

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Author: Sudhish Pachauri (Author)
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₹320.00 ₹380.00
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हिन्दी साहित्य के 75 वर्ष नेहरू युग से मोदी युग तक (एक उत्तर आधुनिकतावादी पाठ) सुधीश पचौरी पिछले सत्तर-अस्सी बरस के साहित्य का इतिहास सीधी लाइन में नहीं चला बल्कि उसमें अनेक टूट-फूट हुई हैं और अनेक विच्छेद आए हैं। ऐसी बहुत सी ‘फॉल्ट लाइनें’ और विच्छेद आज की ‘उत्तर आधुनिक स्थितियों’ में और ‘उत्तर संरचनावादी’ समीक्षा पद्धति के बाद इसलिए और भी अधिक उत्कट होते दीखते हैं क्योंकि आज साहित्य में एक अर्थ, एक प्रातिनिधिक यथार्थ और एकान्विति को नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि अब उसका न कोई एक ‘सेण्टर’ है, न ‘एक यथार्थ’ है और न शब्द का ‘एक अर्थ’ सम्भव है। जब अमेरिका में काले आदमी औरत का ‘पाठ’ गोरे आदमी औरत के ‘पाठ’ से अलग हो सकता है, जब अपने यहाँ दलित ‘पाठ’ गैरदलित ‘पाठ’ से अलग और विपरीत हो सकता है तब एक दिन हिन्दी साहित्य का ‘हिन्दू’ पाठ भी होगा, ‘मुस्लिम’ पाठ भी होगा, ‘सिख’ या ‘बौद्ध’ या ‘ईसाई’ या ‘जैन’ या अन्य पाठ भी सम्भव हैं। जितनी भी अस्मितामूलक पहचानें हैं उन सबके पाठ अलग-अलग हो सकते हैं और कई बार एक-दूसरे के विपरीत और लड़ते- झगड़ते नजर आ सकते हैं। इतना ही नहीं जब दलित विमर्श हो सकते हैं तब ब्राह्मणवादी, वैश्यवादी और क्षत्रियवादी विमर्श भी हो सकते हैं और होंगे और इनके अतिरिक्त, हर ‘अस्मितामूलक समूह’ के ‘स्त्रीत्ववादी’ तथा ‘एलजीबीटीक्यू वादी’ पाठ भी सम्भव हैं। सवाल यह भी है कि आज के ‘उत्तर आधुनिकतावादी’ दौर में जब साहित्य के ‘एक केन्द्रवाद’ का पतन हो चुका हो, तब कौन सा ‘साहित्य शास्त्र’ अथवा कौन सी ‘साहित्यिक सिद्धान्तिकियाँ’ कारगर हो सकती हैं? कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे सवालों से टकराये बिना आगे के साहित्य व साहित्य शास्त्र का विकास सम्भव नहीं दीखता।
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