जिस नायक ने अठारहवीं शताब्दी में उत्तर भारत के राजनीतिक और सामाजिक क्षितिज पर एक नयी शक्ति-सम्भावना को स्वर दिया, जो उस समय की साम्प्रदायिक उथल-पुथल में समरसता, शासन की अराजकता में न्याय और राजनीतिक अस्थिरता में नीति का पक्षधर था, उसे इतिहास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं दिया गया, जिसका वह हकदार था। यह केवल व्यक्तिगत उपेक्षा नहीं थी; यह एक पूरे सामाजिक विमर्श की उपेक्षा थी, ब्रज के उस अंचल की, जिसकी मिट्टी में संघर्ष की सौंध है; उन जाट परम्पराओं की, जो खेतों से किले तक और ग्राम पंचायत से कूटनीतिक दरबार तक फैली हुई थीं। क्या इतिहास केवल वही है जो मुगल दरबारों में दर्ज हुआ या वह भी है जो थून की मिट्टी में गड़ा रहा ? यह पुस्तक उस प्रश्न का उत्तर खोजने की एक ईमानदार कोशिश है। यह प्रयास कोई अकादमिक शोध-ग्रन्थ मात्र नहीं है, न ही यह जीवनी मात्र है। यह एक ऐसे नायक की पुनरावृत्ति है, जो एक राज्य का निर्माता था और एक विचारधारा का वाहक भी था। – प्रस्तावना से