‘जिज्ञासा की परिपाटी’ युवा कवि, आलोचक राहुल देव की आलोचना की नयी किताब है। जिसे पढ़ते हुए पाठक अनुभव करेंगे कि राहुल देव की आलोचना न सिर्फ एक रचना है, बल्कि उसमें भी आलोचक के व्यक्तित्व की गहरी छाप है। एक खास तरह की निजता इनकी आलोचना की पहचान है। राहुल अपनी इस पुस्तक में न सिर्फ आधुनिक व्यंग्य साहित्य का एक मुकम्मल चेहरा पाठकों के सामने उपस्थित करते हैं, बल्कि समकालीन व्यंग्य के परिसर से आधुनिक व्यंग्य और नये व्यंग्य की चुनौतियों को खासतौर से रेखांकित करते हैं। वे उन तत्त्वों और प्रवृत्तियों की ओर इशारा करते हैं जो समकालीन व्यंग्य में ठहराव की वजह हैं। अपने महत्त्वपूर्ण आलेखों के जरिये वह वर्तमान समय की सच्ची रचनाशीलता और उनके तत्त्वों की शिनाख्त करते हैं। राहुल का आलोचक एक जिज्ञासु पाठक की तरह रचना के निकट जाता है। राहुल की आलोचना में बौद्धिक आतंक नहीं है बल्कि वह व्यावहारिक आलोचना के अधिक निकट है। इस दौर के कुछ जरूरी व्यंग्य लेखकों के लेखन पर राहुल बेबाकी से अपनी मौलिक टिप्पणी करते हैं। यह किताब व्यंग्य की तमाम प्रवृत्तियों और प्रतिमानों पर तो विचार करती ही है साथ ही इनके आलोक में व्यंग्यकारों को आलोचना की कसौटी पर परखती भी है। यह किताब अपनी परम्परा को आत्मसात करते हुए हिन्दी व्यंग्य में नयी सम्भावनाओं की खोज का ईमानदार प्रयास करती है। निश्चय ही उनकी यह पुस्तक हमारे समय की व्यंग्यधारा के समक्ष एक जरूरी हस्तक्षेप है। लेखक की तरह ही आलोचक भी अपना मुहावरा खुद गढ़ता है। जाहिर है कि राहुल देव अपनी आलोचना का मुहावरा खुद बनाते हैं। तथ्यों के विश्लेषण में ही नहीं, उनके वर्णन में भी वे आलोचना की नयी सर्जनात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। पाठक अनुभव करेंगे कि राहुल देव हमारे समय की ठस आलोचना को किस तरह नये संस्कार देने का काम करते हैं। हिन्दी व्यंग्य आलोचना में लगभग अकाल की स्थिति है; या तो कोई किताब है ही नहीं, है तो वह ऐसी है कि उसे पढ़कर व्यंग्य के रचनाशास्त्र को समझना लगभग असम्भव हो जाए। भ्रमित कर देने वाली विद्वत्ता और व्यंग्य के बारे में लगभग फतवे देने वाले तेवर; उनमें आलोचना का विवेचन न होकर व्यंग्य की कठिन, अपठनीय परिभाषाओं का और भी कठिन, लगभग अपठनीय शास्त्रीय विवेचन का घटाटोप है, या फिर ऐसी किताबें हैं जो लेखन की राजनीति से उत्पन्न खरपतवार हैं जो खेत को ही खा जाएँ। राहुल देव आलोचना को एक अद्वितीय रचनात्मक अनुभव बना देते हैं जो (पाठक और) रचनाकार को (अपनी) कृति को समझने और आनन्द लेने का आतिशी शीशा नहीं, एक बन्द खिड़की खोलता है- उनकी आलोचना, समझ का भ्रम नहीं, समझ का आलोक और ताजी हवा के झोंके को आने का रास्ता देती है। राहुल देव का आलोचक ‘विधा के आनन्दलोक’ का जिज्ञासु यात्री बनकर आलोचना के जटिल रास्ते पर चलना तय करता है। यह किताब हिन्दी व्यंग्य के अध्येताओं और रचनाकारों के लिए एक आवश्यक किताब जैसी लगी है मुझे। सहज, सरल और बोधगम्य भाषा और कहन में भी गम्भीर आलोचना की जा सकती है, राहुल देव की आलोचना वह आश्वस्ति देती है। – ज्ञान चतुर्वेदी