यह उपन्यास पुराने और नये समय की टकराहट की कहानी कहता है। कुछ मायने में आज के कुछ पति अभी भी पत्नी और उसकी देह को अपनी सम्पत्ति समझते हैं, उच्च शिक्षा और सम्पन्नता के बाद भी उनके सामन्तवादी विचार बदले नहीं हैं। यह एक आधुनिक, उच्च शिक्षित स्त्री, मानसी, की कहानी है, जिसने आर्थिक समस्याओं और परिवार के सुख के लिए उन्नीस वर्ष की आयु में एक सम्पन्न पुरुष से विवाह कर लिया है। विवाह के बाद भी उसमें आगे बढ़ते रहने की तीव्र इच्छा है, और वह आगे बढ़ती भी रहती है और यहीं से प्रारम्भ होती है उसके जीवन की विसंगतियाँ। अन्त में उनका डिवॉर्स हो जाता है और उसके बाद वह जीवन के तमाम पहलुओं का निरीक्षण करती है, घटनाएँ वही हैं, चाहे उसके जीवन की या उसके तहत काम करने वाली अन्य स्त्रियों की। सब आर्थिक रूप से स्वतन्त्र, परन्तु किसी न किसी पुरुष के प्यार में पहले तृप्ति फिर किसी न किसी प्रकार से धोखा खाने वाली। कुछ टूट जाती हैं, कुछ गिरकर फिर सँभल जाती हैं, मगर हरेक को यही कामना है, सन्तुष्टि और तृप्ति की जो आज के पुरुष, पारम्परिक विचार में बँधे मगर नये विचारों के कारण उन्मुक्त। आजकल का आधुनिक समाज, चाहे स्त्रियाँ हों या पुरुष, घर से दूर, काम करके अच्छा अर्जित करते हुए भी किस सम्बन्ध की कामना कर रहे हैं, यह वह स्वयं नहीं जानते। मानसी के सान्निध्य की कामना करते हुए अनेक पुरुष हैं, उसने भी प्यार किया है, परन्तु आज का मूल मन्त्र यही है, जस्ट चिल यार। रजनी गुप्त की भाषा जगह-जगह कवित्वमय हो गयी है, उसमें रवानगी और बहाव है जिसके कारण पाठक कहानी के साथ-साथ चलता रहता है। लेखिका में आज के विभ्रमित नवयुवक और युवतियों की मानसिक और शारीरिक जरूरतों को पहचानने की अपूर्व क्षमता है, और लगता है कि जिस समाज और तबके का वह वर्णन कर रही हैं, उसका मूल मन्त्र बन गया है, जस्ट चिल यार। – उषा प्रियंवदा (वरिष्ठ कथाकार)