कांशीराम जैसे विराट व्यक्तित्व की जीवनी लिखने के लिए मूल स्त्रोत उनके तैयार किये हुए बहुजन समाज के उनके सिपाही हैं जिन्होंने उनके साये में वह कारवाँ तैयार किया जिसकी रूपरेखा कांशीराम ने खुद लिखी थी। उन्हीं लोगों के सहारे इस जीवनी के पन्ने आगे बढ़ते चले जाते हैं। उनके बारे में लिखते हुए जिन अनुभवों से गुजरना हुआ, उतना उनके बनाये हुए योद्धाओं के साथ काम करने में भी नहीं हुआ था। सन् 1993 में पहली बार सत्ता की चाबी जब बसपा के हाथ आयी तब से लेकर चौथी बार सुश्री मायावती के नेतृत्व में बसपा सरकार की मशीनरी को करीब से देखने के बाद भी वह अनुभूति नहीं हुई थी जो इस किताब को लिखने के दौरान हुई। कांशीराम जी को पास से देखा, उनसे कई बार सामना भी हुआ और उनके कामों को पूरा करने में सहभागी बनने के दौरान भी उनके मिशन के अत्यधिक कठिन परिश्रम को समझ नहीं पाये थे। लेकिन उनके प्रतिबद्ध सिपाहियों ने जब तब जो भी उनके बारे में बताया था, उससे मान्यवर कांशीराम जी के बारे में सोचने और उन्हें समझने की जिज्ञासा बढ़ती गयी थी। उनकी शख्सियत का सबसे उजला पक्ष ही यही था कि जिसे भी उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला है, वह उनसे गहरे प्रभावित हुए बिना शायद ही रह सका हो। आज भी उनके तैयार किये हुए योद्धा कहीं न कहीं किसी न किसी स्तर पर उनकी छेड़ी हुई सामाजिक और राजनीतिक क्रान्ति के अगुवा बने हुए हैं। – भूमिका से