कलकत्ता के फ़ोर्ट विलियम में बैठे लॉर्ड कैनिंग के हुक्म पर भारी भरकम फ़ौज के साथ मेजर जनरल हैनरी हैवलॉक की रवानगी की ख़बर मिलते ही अजीजन बाई ने पैरों में लगा मोहब्बत का आलता पोंछ दिया। अब अजीजन को न शम्सुद्दीन की पाज़ेब मंज़ूर थी न मांग में सिंदूर सजाने की अर्ज़ी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की कैवलरी का सेनापति शम्सुद्दीन आज उस नौकरी से इस्तीफ़ा दे चुका था जिस नौकरी का नाम था इश्क़। एक ऐसी नौकरी जिसकी पाई-पाई वो अजीजन के इन्तज़ार में ख़र्च कर चुका था। इश्क़ की ये ग़ैर-मुरद्दफ़ ग़ज़ल कभी मुक़म्मल हो ही नहीं सकती थी क्योंकि इस ग़ज़ल का रदीफ़ ही लापता था और सारी ज़िम्मेदारी महज़ क़ाफ़िये पर थी। मोहब्बत और निकाह के बीच सिर्फ़ एक नुक़्ते भर का फ़ासला था मगर इस ग़ज़ल के एक भी लफ़्ज़ की मात्रा गिराकर बहर मिलाने की इजाज़त क्रान्ति ने बख़्शी ही नहीं थी। प्रेमग्रन्थ के पन्नों पर अजीजन और शम्सुद्दीन की बिलखती बेबसी के ठीक उलट कम्पनी कमांडर जनरल ह्यू मैसी व्हीलर की बेटी मार्गरेट व्हीलर और मामूली से ख़ानसामे अली खाँ की दिलक़शी उन्स, मोहब्बत, अक़ीदत, इबादत और जुनून को पार करती हुई मौत तक पहुँच चुकी थी। ये तो तय नहीं था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी इस मोहब्बत को ज़िन्दा रहने देगी या नहीं लेकिन दोनों इश्क़ज़ादे इश्क़ पर क़ुर्बान होने के लिए कफ़न की तैयारी ज़रूर कर चुके थे। गंगा के साथ-साथ बह रही इस कहानी में क़ुर्बान तो दोनों ही जोड़े हो रहे थे मगर एक इश्क़ पर क़ुर्बान था और दूसरा क्रान्ति पर। जान गँवाने को तैयार मार्गरेट और अली ग़ालिब से पूछ रहे थे– ‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है’ जबकि प्यार गँवाने को राज़ी अजीजन और शम्सुद्दीन का मिर्ज़ा से सिसकता सवाल था...‘आख़िर इस दर्द की दवा क्या है’।
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7 अक्टूबर, 2023, वो काला दिन जब हमास ने इज़रायल पर हमला किया। ठीक उसी दिन इज़रायल की राजधानी तेल अवीव से सिर्फ़ चौदह किलोमीटर दूर हर्ज़लिया में कंकाल हो चुकी रद्दी का एक पुलिंदा मिला जिस पुलिंदे में दफ़्न थी 166 साल पुरानी एक ख़ामोश कहानी। एक ऐसी कहानी जो थी तो सिर्फ़ 68 दिनों की लेकिन इन 68 दिनों में क़त्ल हुए अस्सी हज़ार से ज़्यादा मासूमों की चीख़ें इन काग़ज़ों की झुर्रियों में साफ़ सुनाई पड़ रही थीं। इज़रायल से साढ़े तीन हज़ार किलोमीटर दूर हिन्दुस्तान में दिल्ली से चला क़त्ल का ये कारवाँ बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ होता हुआ कानपुर पहुँचता है और एक ऐसे कसाई से रूबरू होता है जिसका नाम था कर्नल जेम्स स्मिथ नील। जलियांवाला बाग़ को अंजाम देने वाले जनरल डायर से ज़्यादा ख़ूंख़ार, दरिन्दगी में पोलपोट, ईदी अमीन और हिटलर को भी कोसों पीछे छोड़ने वाले इस शैतान ने सिर्फ़ एक स्पॉट पर पौने चार घण्टे में नौ सौ से ज़्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। हिन्दुओं को गाय और मुसलमानों को सुअर का मांस खिलाने के बाद बिजली के खम्भों पर फाँसी चढ़ाने वाले इस यमराज ने क्रान्तिवीरों के लिए कानपुर को बना डाला था–‘कसाईबाड़ा’। 1857 की इस कहानी में परत दर परत खुलती साज़िशें भी हैं, सनसनी भी, रक्तबीज भी हैं, रक्तपात भी, तलवार की धार भी है, बारूद का दहकता ग़ुबार भी, इश्क़ भी है इंक़लाब भी, कोठे पर उमराव जान के छनकते घुँघरुओं की झंकार भी है और अमीर ख़ुसरो की सूफ़ियाना ग़ज़लों का गुलज़ार भी, महल का दीवान-ए-ख़ास भी है और अनसुना, अनकहा, अनसुलझा ख़ूनी इतिहास भी।