केंद्रित उनका उपन्यास– ‘ख़ुदा सही सलामत है' हिंदी साहित्य की विरल उपलब्धि है। एक ऐसा उपन्यास जो दोनों समाज के लगाव और द्वंद्व, मिलन और टूटन को सतह से नहीं गहरे पैठकर देखता है। रवीन्द्र कालिया जब साठोत्तरी कहानी के दौर में थे तब कहानी के युवा तुर्क के रूप में हलचल के बीच थे; जब 'ग़ालिब छूटी शराब' के संस्मरणकार के रूप में आये तो परिदृश्य पर छा गए; फिर जब ‘वागर्थ’ एवं ‘ज्ञानोदय' के संपादक बने तो एक सक्षम नयी कथा पीढ़ी को गढ़ने में अहम योगदान दिया। साहित्यकार रवीन्द्र कालिया के व्यक्तित्व के ये सभी आयाम एक-दूसरे के सामने भी हैं और परिपूरक भी हैं। जिस ओर से देखिए पलड़ा उसी ओर झुका मालूम पड़ेगा। ऐसे में उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के समग्र मूल्यांकन की आवश्यकता थी। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए राजीव कुमार के संपादन में यह पुस्तक आपके समक्ष प्रस्तुत है। इस पुस्तक में कालिया जी के साहित्यिक व्यक्तित्व के हर आयाम को समेटने का प्रयास किया गया है। रवीन्द्र कालिया के पाठकों एवं अध्येताओं के लिए यह एक सुंदर सौगात है ।