लोक-आस्था के एक लगभग अल्पज्ञात बिन्दु से चलकर उत्तर भारत के बड़े भू-भाग में वार्षिक जन-परिघटना बनने तक काँवड़ की यात्रा अनेक समाजार्थिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं से गुजरी है। पहले यह मुख्यतः श्रद्धालु व्यक्ति का निजी प्रयास हुआ करती थी। उस समय इन तीर्थ यात्रियों के ठहरने और भोजन आदि के लिए कोई सामूहिक-संगठित व्यवस्था नहीं थी। लेकिन पिछले चार दशकों में यह यात्रा व्यक्ति-केन्द्रित आस्था से आगे बढ़कर एक वृहत् सामुदायिक प्रदर्शन बन गयी है। जाहिर है कि काँवड़ यात्रा के इस कायान्तरण को केवल एक नज्जरिये या परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं समझा जा सकता। नरेश गोस्वामी की यह किताब इस परिघटना को खेतिहर अर्थव्यवस्था के संकुचन, देहात और शहर के द्वन्द्व, शहर की परिधि और केन्द्र के विभाजन, लोकधर्म और शास्त्रोक्त धर्म के सन्धि-स्थल की गतिकी, नागरिक सुविधाओं की दावेदारी के इर्द-गिर्द उभरती अनौपचारिक राजनीतिक प्रक्रियाओं आदि जैसे विभिन्न और व्यापक कोणों से देखने का प्रयत्न करती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि हिन्दी में मौलिक समाज विज्ञान लेखन के लिए प्रथम सेतु पाण्डुलिपि पुरस्कार प्राप्त इस पुस्तक का उत्साहपूर्ण स्वागत होगा तथा ऐसे अन्य प्रयासों को भी यथोचित प्रोत्साहन मिलेगा।