अशोक भाटिया तमाम तामझाम से दूर रहकर लघुकथा में रचना, आलोचना, सम्पादन, विमर्श के क्षेत्रों में निरन्तर गम्भीरता से काम करते आ रहे हैं, जिस कारण इन्हें पढ़ा और सुना जाता है। ‘लघुकथा की संगत’ पुस्तक अठारह अध्यायों में लघुकथा के बढ़ते सामाजिक-साहित्यिक हस्तक्षेप के सभी पक्षों की शिद्दत से पड़ताल करती है। ‘लघुकथा : लघुता में प्रभुता’ जैसे अध्यायों में लघुकथा की सैद्धान्तिकी गढ़ने का प्रयास हुआ है, तो ‘लघुकथा और शास्त्रीय सवाल’ तथा ‘लघुकथा आकार का प्रश्न’ अध्यायों में इस क्षेत्र में उभरे सवालों से रचनात्मक धरातल पर दो-चार होते हुए लघुकथा क्षेत्र में पनप रही अ-रचनात्मक धारणाओं को स-तर्क निरस्त भी किया गया है। लघुकथा के वस्तु-पक्ष, प्रतिरोध के स्वरूप, भाषा, बुनावट और प्रयोगशीलता के विविध आयामों की वर्तमान लघुकथा में उपस्थिति की धैर्यपूर्वक गहन पड़ताल करने वाले अनेक अध्याय इस पुस्तक की महत्ता को बढ़ाते हैं। लघुकथा के समग्र परिदृश्य पर केन्द्रित इस आलोचना-पुस्तक के सभी अध्यायों में लघुकथा को सामाजिक दायित्व व साहित्यिक गरिमा प्रदान करने वाले प्रयासों के साथ-साथ श्रेष्ठ रचनाशीलता की बानगी भी मिलती है। लघुकथा के पाठकों, लेखकों और शोधार्थियों को, सहज-सजग रूप में लिखी इस पुस्तक में, हिन्दी लघुकथाओं के कुल हासिल की एक भरी-पूरी झलक अवश्य मिल जाएगी। – राजेन्द्र टोकी