पुस्तक खरीदते समय पाठक सोचता है कि शीर्षक और कवर देखकर तो पुस्तक आकर्षक और खरीदने लायक लग रही है, लेकिन इस समय अगर किसी समझदार और सुलझे हुए व्यक्ति या विषय विशेषज्ञ की संक्षिप्त लेकिन भरोसेमंद राय मिल जाए तो कितना अच्छा हो! एक समय था जब लोग पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा पढ़कर खरीदने का निर्णय करते थे, लेकिन वो जमाना चला गया। अब तो आलम यह है कि आलोचना का स्थान समीक्षा ने, समीक्षा का स्थान प्रचार ने और प्रचार का स्थान प्रशस्ति ने ले लिया है। अपनी कमियों–कमजोरियों के बारे में कुछ सुनने का माद्दा लेखकों में बहुत कम हो गया है। इसलिए पुस्तक चर्चा की विश्वसनीयता भी बहुत कम हो गयी है।