"नीलावंती' नामक मूल ग्रंथ के बारे में कहा जाता है कि जो भी उसे पूरा पढ़ता है, वह या तो आत्महत्या कर लेता है या पागल हो जाता है। उसी मूल ग्रंथ पर आधारित है यह उपन्यास्त्र ।
लेकिन इस उपन्यास से भयभीत होने की जरूरत नहीं है, बल्कि भय तो इस बात का है कि एक बार इसे हाथ में लेने के बाद इसे छोड़ पाना मुश्किल हो जाता है। कहानी आपको अपने साथ इस तरह बाँध लेती है कि इसे पूरा पढ़े बिना आप रुक नहीं पाएँगे।
हे मनुष्य,
तुम भ्रम में हो।
तुमने कहा, "मैं प्रकृति की भाषा सीखने यहाँ आया हूँ।
" गलत। तुम प्रकृति की भाषा सीखने यहाँ नहीं आए हो।
तुम्हारे मन में भय है।
उस भय का कारण है-तुम स्वयं से बात नहीं कर सकते।
तुम्हें स्वयं से बात करना सीखना है।
तुम अपने साथ एक शव लेकर आए हो।
तुम कहते हो, “इस शव को फिर से जीवित करना है।
" हे मनुष्य, जब तुम स्वयं से बात करना सीखोगे, तभी तुम्हें एहसास होगा, तुम्हें उस शव को नहीं,
स्वयं को जीवित करना है।