यह किताब सिर्फ़ एक आत्मकथात्मक उपन्यास नहीं है, बल्कि उन तमाम लोगों की कहानी है जो घर से दूर निकलते हैं, अपने हिस्से की धूप सहते हैं और फिर एक दिन समझ जाते हैं कि सबसे लंबी यात्राएँ अपनी जड़ों तक लौटकर ही पूरी होती हैं।
एक बीज के अंकुरित होने की यात्रा जितनी सुंदर दिखती है, उतनी ही कठिन भी होती है। लेकिन उस बीज के भीतर हमेशा उस बरगद की स्मृति बची रहती है, जिसकी ठंडी और मुलायम छाँव ने उसे पहली बार जीवन का अर्थ सिखाया था।
दरअस्ल यह यात्रा कभी पूरी नहीं होती। कुछ यादें, कुछ जगहें और कुछ लोग कभी पीछे नहीं छूटते। हम चाहे जितनी दूर निकल जाएँ, हमारे भीतर का एक हिस्सा हमेशा वहीं रहता है। शायद इसी वजह से यह किताब ख़त्म होने के बाद भी लंबे समय तक हमारे भीतर चलती रहती है।