सआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई, 1912 को समराला जिला लुधियाना में हुआ। बैरिस्टरों का परिवार था। पिता मियां गुलाम हसन सेशन जज थे। माता का नाम सरदार बेगम था। कश्मीरी मूल के मंटो की प्रारम्भिक शिक्षा अमृतसर के मुस्लिम हाई स्कूल में हुई। फिर हिन्दू-सभा कॉलेज और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में, जहाँ से तपेदिक की बीमारी की आशंका में निकाल दिये गये। पत्नी का नाम सफ़ीया था। तीन बेटियाँ और एक बेटा, जिसका बचपन ही में देहान्त हो गया। पहला कहानी संग्रह ‘आतिशपारे’ (1936) था। रूसी और फ्रांसीसी साहित्य का उर्दू में अनुवाद किया। पत्रकारिता की, रेडियो फ़ीचर और फ़िल्म-लेखन किया। विभाजन के बाद 1948 में पाकिस्तान चले गये। 18 जनवरी, 1955 को लाहौर में देहावसान हुआ। मंटो अपनी साफ़गोई और बेबाकी के कारण चर्चित भी रहे और विवादास्पद भी। अविभाजित और विभाजित भारत में उनकी कहानियों पर क़ानूनी कार्रवाइयाँ हुईं। ‘काली शलवार’, ‘ठंडा गोश्त’, ‘बू’, ‘धुआँ’, ‘खोल दो’ आदि के लिए उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़े। उनपर अश्लील लेखन का इल्ज़ाम लगा तो प्रगतिशील लेखकों ने उन्हें प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया। मंटो ने इसे ‘अदब बाहर’ करने की संज्ञा दी। मंटो में सर्जनात्मक समर्पण था। उनका कहना था, ‘मैं अफ़साना नहीं लिखता, हक़ीक़त यह है कि अफ़साना मुझे लिखता है।’ उनका विचार था कि ‘दुनिया को समझाना नहीं चाहिए, उसको खुद समझना चाहिए।’ कहानी-कला में उनकी मान्यता थी कि ‘अदब या तो अदब है, वरना एक बहुत बड़ी बेअदबी है।’ मंटो की प्रासंगिकता का रहस्य इस बात में भी है कि उन्होंने समाज में साधारण समझे जाने वाले लोगों की असाधारण मूल्य-निष्ठा को अपने कथा-कौशल से उजागर किया है।