किताब में शामिल मंटो के दोस्त कृश्न चन्दर, शाहिद अहमद देहलवी, मुहम्मद असद्धल्लाह, इस्मत चुगताई, बलवन्त गार्गी, नरेश कुमार शाद, अहमद नदीम क़ासमी, शोरिश काश्मीरी, मिर्जा अदीब, नसीर अनवर, मुहम्मद ख़ालिद अख्तर, राजा मेहदी अली खान, अली सरदार जाफ़री, इब्राहीम जलीस, हमीद अख़्तर, मुहम्मद तुफैल फ़िराक़ साहब ने एक जगह बहुत पते की बात कही है। शे’र-ओ-शायरी की चर्चा करते हुए फ़रमाते हैं कि शे’र को समझना शे’र कहने से कहीं बहुत मुश्किल है। उनकी यह बात ऊँची सतह के हर अदब पारे के लिए सही कही जाएगी और इसलिए यह बात यक़ीनन मंटो के बारे में सच है, जिसके यहाँ कबाड़ तो बहुत है, लेकिन ऊँचे दर्जे का अदब भी कुछ कम नहीं है। एक लम्बे अरसे तक मंटो को पढ़ चुके हजरात भी यह दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने मंटो को भलीभाँति समझ लिया है। यहाँ हमारे दोस्त जाहिद खान ने इस किताब में जो ख़ाके जमा किये हैं, उनकी उपयोगिता को इसी सन्दर्भ में परखा जाना चाहिए। जहाँ जदीदीयत की यह बात सही है कि किसी अदीब की ज़िन्दगी और अदब में कोई सम्बन्ध होना जरूरी नहीं है, वहीं हम यह दावा नहीं कर सकते कि अदीब की ज़िन्दगी और अदब में कोई सम्बन्ध होता ही नहीं। लेकिन हम इतना तो कह ही सकते हैं कि ख़ाके इस सिलसिले में यक़ीनन कुछ रहनुमाई कर सकते हैं। हाली की ‘यादगार-ए-ग़ालिब’ को किनारे रखकर हम ग़ालिब को समझने के कितने क़ाबिल हो सकते हैं? मंटो के समकालीनों ने मंटो के बारे में ये जो ख़ाके लिखे हैं, उनमें अगर थोड़ा-बहुत पूर्वाग्रह हो, तो भी मंटो को समझने में ये एक हद तक मददगार तो हो ही सकते हैं, और इनको इसी नजरिये से पढ़ा जाना चाहिए, इसी नजरिये से परखा भी जाना चाहिए। इतनी बात तो जरूर याद रहनी चाहिए कि मंटो की शख्सियत बहुत विवादास्पद रही है, और उसे कोई ख़ाका-निगार किस नज़रिये से देखता है, इसकी भी अपनी जगह एक अहमियत है। — नरेश ‘नदीम’ (वरिष्ठ आलोचक और चर्चित अनुवादक)