सन् 1856 में दुनिया की सबसे ऊँची चोटी की खोज की आधिकारिक घोषणा हुई थी। उससे पहले किसी भी भूगोलवेत्ता या वैज्ञानिक को मालूम न था कि धरती का सबसे ऊँचा स्थान हिमालय के पहाड़ों में ही है। यहाँ तक कि माउण्ट एवरेस्ट के आसपास रहने वाले स्थानीय लोग भी इस तथ्य से अनभिज्ञ थे कि जिन पहाड़ों को वे प्रतिदिन देखा करते थे उन्हीं में से एक दुनिया का सबसे ऊँचा पहाड़ था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब इस देश की धरती से हिमालय के गगनचुम्बी शिखरों के प्रेक्षण का अभियान शुरू हुआ और प्रेक्षण के बाद गणना हुई, उसके बाद ही दुनिया की सबसे ऊँची चोटी की खोज हो पायी थी। लेकिन किस्सा यहीं खत्म नहीं हो जाता। उच्चतम शिखर की खोज होते ही विवादों और असहमतियों का दौर आरम्भ हो गया। पहला विवाद तो उसके नाम को लेकर ही उठा था और तब यह कहा गया था कि दुनिया की सबसे ऊँची चोटी का नाम उस व्यक्ति पर रख दिया गया जिसका उस अभियान से कोई सम्बन्ध न था। यहाँ तक कि उसने उस शिखर को देखा भी न था। दूसरा विवाद उसकी ऊँचाई की गुणवत्ता को लेकर था। माउण्ट एवरेस्ट का प्रेक्षण लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी से किया गया था और इसी कारण से वैज्ञानिकगण इस प्रेक्षण की गुणवत्ता को लेकर सशंकित थे। तीसरा विवाद इसकी पहचान को लेकर उठा था। माउण्ट एवरेस्ट को शर्मीला पहाड़ माना जाता था। ऐसा मानने के पीछे कारण यह था कि यह अपने ऊँचेपन का अहसास नहीं होने देता था। इस वजह से बहुत से अन्वेषकों द्वारा इसे पहचानने में चूक हो जाती थी और वे किसी और पहाड़ को माउण्ट एवरेस्ट समझ लेते थे और उनके यात्रा विवरणों से भ्रम की स्थितियाँ बन जाती थीं। इस तरह से इस पुस्तक में माउण्ट एवरेस्ट के अन्वेषण से सम्बन्धित विविध आयामों को कथात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। रेखाचित्रों और छायाचित्रों की सहायता से पुस्तक को रोचक बनाने का प्रयास किया गया है ताकि हर आयु वर्ग के पाठकों को आसानी से सम्प्रेषित हो जाए। इस पुस्तक में माउण्ट एवरेस्ट के अन्वेषण अभियान में भारतीय गणितज्ञ राधानाथ सिकदर के योगदान का भी उल्लेख हुआ है। आम पाठकों की वैज्ञानिक चेतना के परिवर्द्धन में भी यह किताब सहायक हो सकती है।