मुक्तिबोध कुछ दशकों से हिंदी के सर्वाधिक चर्चित रचनाकार रहे हैं। उनपर काफी कुछ लिखा गया है। लेकिन `मुक्तिबोध की लालटेन` कई मायनों में उस काफी कुछ से अलग है, इसमें आलोचनात्मक और अकादमिक दर्रे पर होने की कतई परवाह नहीं की गई है। यह किताब मुक्तिबोध को कवि, आलोचक, चिन्तक के खानों में बाँटकर उनपर विचार नहीं करती, न कुल मिलाकर कोई समालोचनात्मक सार प्रस्तुत करती है।