यह उपन्यास उस दौर का है जब मोबाइल फ़ोन नहीं थे, टेलीफ़ोन भी कम ही घरों में हुआ करते थे।टीवी का होना एक सौभाग्य माना जाता था। तब बच्चे सिर्फ़ खेल-कूद और चटपटी बातों में ही मसरूफ़ रहते थे।जब पापा से मिले 2 रुपए ही दिन गुज़ारने के लिए काफ़ी होते थे। तीन दोस्त और उनके इर्द-गिर्द बदलता समाज और उनके अंदर की जिज्ञासा। हाथ वाले वीडियो गेम से लेकर प्लेस्टेशन के दौर से पहले की है दास्तान। नोकिया 1100 का आना, मारियो, टेकेन-3, मुस्तफ़ा जैसे गेम्स का बच्चों के सर पर ख़ुमार चढ़ना। कैसे वक़्त के साथ सब चीज़ें धुंधली पड़ गईं और 90 का दशक बहुत पहले का दशक मालूम पड़ता है। शायद ही फिर ऐसा दशक लौटकर आए। इस दशक ने बहुत कुछ दुनिया को दिया भी तो साथ ही बहुत कुछ अपने साथ ले भी गया। टेक्नोलॉजी से ग्रस्त होता इंसान वापस से उस दौर में लौटना चाहता है जहाँ सुकून हो, चुहलबाज़ी हो और रात-दिन की भागदौड़ से छुटकारा हो। तो आइए, अफ़ज़ल की दुनिया में खो जाइए फिर से उस दशक को जीने के लिए।