आज के समय में, जीवन का आकलन इस बात से किया जाता है कि 'मैंने कितनी कुशलता से काम किया' बजाय इसके कि हम जो करते हैं उससे हमें कितनी 'संतुष्टि' मिलती है, जो कि गलत है। जब से 'समय ही पैसा है' की अवधारणा लोगों के दिमाग में घर कर गई है, लोग फुर्सत के क्षणों का आनंद लेना भूल गए हैं। कार्यकुशलता की चाह में मनुष्य दिन ब दिन अकेला होता जा रहा है, जिससे बीमारी, अवसाद और आत्मघाती विचार आ रहे हैं। इसीलिए इस पुस्तक में फुर्सत के क्षणों को कैसे खोजा जाएं और खालीपन, कुछ न करना इन संकल्पनाओं को अपना दुश्मन न समझते हुए उसे दोस्त मानने का अनोखा विचार प्रस्तुत किया गया है।