रविभूषण हिन्दी साहित्यिक-बौद्धिक स्फीयर में एक ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिनकी चिन्ता साहित्य तक सीमित नहीं है। उनकी चिन्ता के दायरे में समाज और उसके लोग भी हैं। यह समाज अधिकांशतः तो भारतीय है, परन्तु उसके सामने भूमण्डलीकृत दुनिया की चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। पुस्तक के विस्तार से जो निष्कर्ष निकलता है वह यह कि लेखक की चिन्ता मानव मात्र की है। मनुष्य के जीवन को प्रभावित करने वाले तमाम विचार, विचारधारा, राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक संगठन उनकी चिन्ता का सबब हैं। इन इकाइयों में भी वे तत्त्व जो मनुष्य की गरिमा को आहत करते हैं, उनकी पैनी नजर से बच नहीं पाते। इस तरह वे जनता के प्रति प्रतिबद्ध बौद्धिक हैं। प्रतिबद्धता के मायने रविभूषण के साहित्य और पत्रकारिता में एकहरा नहीं है। वह अनेकायामी है। उपर्युक्त सन्दर्भों से इतर प्रतिबद्धता का एक अर्थ राजनीतिक विचारधारात्मक संश्लेष से भी है। इनके यहाँ विचारधारा जीवन की व्यावहारिक जमीन के लिए खाद-पानी का काम करती है। रविभूषण के निबन्धों का यह संग्रह लगभग बीस वर्षों के उनके लेखन का प्रतिनिधित्व करता है। ये निबन्ध ‘सबलोग’ पत्रिका और ‘जन सन्देश टाइम्स’ अखबार में प्रकाशित होते रहे हैं। ये निबन्ध उनके निडर बौद्धिक हस्तक्षेप का साक्ष्य हैं।