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Indigo Books
Fiction

Rājendra Cola kā prakopa

S
Author: Sātyaki (fictional writer), Mejara Garga
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Paperback
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1001 ईस्वी। 30 वर्षीय महमूद गजनवी सल्तनत की बागडोर संभालता है और अपना रुख़ पूरब की ओर करता है। मज़हबी उन्माद से प्रेरित होकर, वह भारतवर्ष काफ़िरों और जादूगरों की भूमि, और धन-संपदा और वैभव की भूमि में उत्पात और नरसंहार का ऐसा क्रूर नाच आरंभ करता है, जैसा दुनिया ने पहले कभी न देखा।
1025 ईस्वी। राजेन्द्र चोल चेरा और पांड्य वंशों का विजेता, गंगा तक विजय प्राप्त करने वाला, और वेंगई का अधिपति श्रीविजय राज्य के विरुद्ध एक नौसैनिक अभियान पर निकलने को तत्पर है, तभी उसे सोमनाथ मंदिर के विध्वंस का समाचार मिलता है।
इसी बीच, अज्ञात लिपि में अंकित एक प्राचीन ग्रंथ, अपने संरक्षक को पुकारता है, अपने रहस्यों के प्रकट होने की प्रतीक्षा में।
एक आक्रोशित पुत्र, युद्ध की लालसा में अपनी अव्यक्त नियति लिए-अपने मार्ग में विनाश बिखेरता हुआ आगे बढ़ता है।
एक प्राचीन परंपरा से निकली एक घातक योद्धा, अपने सुल्तान की अतृप्त महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने और उसका विश्वास जीतने के लिए अपने कौशल का प्रयोग करती है।
इस काल्पनिक कालरेखा में, सोमनाथ मंदिर के विध्वंस से आक्रोशित हो, चोल सम्राट, आकस्मिक रूप से अपनी योजनाएँ बदलता है और महमूद से सीधे टकराने का निर्णय लेता है।
क्या राजेन्द्र चोल का यह एक निर्णय भविष्य बदल देगा और आने वाले ग़ौरी, खिलजी, बाबरों को रोक पाएगा? बार-बार होने वाले नरसंहारों को टाल पाएगा? या फिर भारतवर्ष का अस्तित्व ही मिट जाएगा?
यह कहानी है पूर्व पक्ष, स्वयंबोध, और शत्रुबोध की, एक कथा धर्म और अधर्म के बीच उस युद्ध की, जो कभी हुआ नहीं, पर जिसके पास इतिहास को बदल देने की क्षमता थी।
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