प्रोफ़ेसर प्रभाती नौटियाल द्वारा फेदेरीको गार्सीआ लोर्का की कृति का मूल स्पानी से हिन्दी में अनुवाद एक बड़ी ख़बर तो है ही, उनके साहित्यिक सृजन की सार्वभौमता का प्रमाण भी। यह बहुत अच्छी खबर है क्योंकि भारत उन देशों में से एक है जहाँ 20वीं सदी के सार्वभौम साहित्य में, सबसे महत्त्वपूर्ण में से एक, इस स्पानी रचनाकार की कविता को बेहतरीन समझ के साथ जोशीला स्वागत मिला है, और जो कि समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है। हक़ीक़त यह है कि गार्सीआ लोर्का की कविताएँ और नाटक, मान्यताओं की परवाह किये बिना, उन समस्याओं के बारे में बात करते हैं जो अन्ततः मनुष्य मात्र की गरिमा से सम्बन्धित हैं, और निस्सन्देह उसमें योगदान भी करते हैं। गार्सीआ लोर्का हमें याद दिलाता है हमारी इच्छाओं, सपनों और हमारी जो भी उम्मीदें हों उनकी । हिन्दी में इस नये अनुवाद के साथ, यह भी साबित हो गया है कि गार्सीआ लोर्का की रचनाएँ समय, मतभेदों और भौगोलिक सीमाओं के पार, इंसान के रूप में हमें एकजुट करती हैं। समय के साथ, क्योंकि, 20वीं सदी के मनुष्य ने, उनके समकालीन होने के नाते, जीवन की कला के बारे में उनके दृष्टिकोण की भरपूर सराहना की। आज का मानव मात्र, जानता है कि हम कल भी भावी पाठकों के साथ जरूर एकजुट होंगे। और भौगोलिक सीमाओं के पार क्योंकि यह यहाँ भारत में, गार्सीआ लोर्का की मातृभूमि ग्रानादा से बहुत दूर, स्पानी में लिखी गयीं उनकी कविताएँ, नाटक, उनकी भावनाएँ हिन्दी और हिन्दी समाज में स्थान पा रही हैं और कालान्तर में भी सर्वश्रेष्ठ कविता का जन्म होता रहेगा।