प्रस्तुत पुस्तक में संस्कृत साहित्य की वेदों से लगा कर आधुनिक काल तक फैली कई हजार वर्षों की सम्पन्न परम्परा में गर्हणात्मक भाषा अथवा धिक्कार तथा गालियों के प्रयोगों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसकी रचना गर्हणात्मक भाषा को अपनाने या गालियाँ बकने की शिक्षा देने के लिये नहीं की गई है। गर्हणात्मक भाषा, धिक्कार तथा गालियाँ कहाँ उपादेय होती हैं, और कहाँ वे मनुष्य की सर्जनात्मकता ऊर्जा की अचूक अभिव्यक्ति बनती हैं, तथा कहाँ उसकी चूक बनती हैं-इन दोनों बातों को समझ कर हम कैसे अपने भाषिक व्यवहार में सुधार कर सकते हैं - यह बताने के लिये इसकी रचना की गई है। संस्कृत साहित्य में अन्याय का विरोध करने की, पापियों तथा आततायियों को धिक्कारने की तेजस्वी परम्परा रही है। और इसको पहचाने बिना भारत की सांस्कृतिक विरासत को सही-सही नहीं समझा जा सकता। संस्कृत के बारे में यह दुष्प्रचार किया जाता रहा है कि वह केवल धर्म और कर्मकाण्ड की भाषा है। इसके साथ ही यह भी कहा जाता रहा है कि वह जनसमाज में बोलचाल की भाषा न तो पहले थी, न आज है। संस्कृत के सम्बन्ध में ये दोनों ही पक्के झूठ हैं।