किसी भी विधा के समकाल का आकलन करना आसान नहीं होता। पूर्ववर्तियों के अवदान के बारे में धारणाएँ और मान्यताएँ बन चुकी होती हैं जबकि समकालीनों की बाबत बहुत कुछ अस्थिर होता है। रचनाकारों के मूल्यांकन के प्रश्न को एकबारगी किनारे रख दें, तो भी कई चुनौतियाँ बरकरार रहती हैं। मसलन, कौन सा रुझान आने वाले दिनों में कमजोर पड़ जाएगा और कौन सा रुझान दिशा-निर्धारक स्वरूप ले लेगा, यह अनिश्चित रहता है। लिखे जा रहे के पूरे विस्तार की थाह लगाना भी सरल काम नहीं। शायद इसीलिए सुपरिचित आलोचक अरुण होता ने अपनी इस किताब ‘समकालीन कविता का जनतन्त्र’ में समग्रता का दावा नहीं किया है। लेकिन उनकी इस पुस्तक का फलक कई मायनों में बड़ा है। हिन्दी की समकालीन कविता को समझने-परखने के सिलसिले में उन्होंने पाँच पीढ़ियों के चुनिन्दा कवियों पर विचार किया है, जिसमें केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी से लेकर अनेक युवतर कवि तक शामिल हैं। जाहिर है इससे समकाल के उनके दायरे का अन्दाजा लगाया जा सकता है। फिर, होता ने भूमण्डलीकरण, बाजारीकरण, पर्यावरण संकट से लेकर हमारे समय और समाज के हर प्रश्न के परिप्रेक्ष्य में समकालीन हिन्दी कविता को पढ़ा-परखा है तथा उसके विविध आयामों को उद्घाटित करते हुए स्त्री-स्वर व आदिवासी-स्वर को अलग से भी रेखांकित किया है। इस सब के अलावा कथ्य के वैविध्य और शैली तथा शिल्प के मद्देनजर भी उन्होंने हिन्दी कविता पर विचार किया है। आलोचक अरुण होता ने आधुनिक हिन्दी कविता की संवेदना और सरोकार को विस्तार से जाना-समझा है और इस उद्यम में वह पहले ही दो पुस्तकें लिख चुके हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी यह नयी पुस्तक भी महत्त्वपूर्ण मानी जाएगी।