महात्मा गांधी के दर्शन और उसपर अमल को लेकर जो मुद्दे सर्वाधिक चर्चा का विषय रहे हैं उनमें एक यह है कि आज की पेचीदा परिस्थितियों में यह कहाँ तक कारगर है। गांधी की महान् शख्सियत, दुनिया को उनके योगदान और उनके मूल्यों को मान देते हुए भी कार्यनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से समय-समय पर कुछ संशय जताये गये हैं। पृष्ठभूमि में जाएँ तो इसकी खास वजह यह मालूम पड़ती है कि सत्य और अहिंसा को सदियों से वैयक्तिक उन्नयन और आध्यात्मिक साधना के लिए तो अनिवार्य माना जाता रहा है लेकिन सामाजिक नजरिये से यह गम्भीर विचार और व्यापक प्रयोग का विषय नहीं रहा। गांधी ने अपने सत्याग्रहों से यह दिखाया कि उनका तरीका जितना वैयक्तिक है उतना ही सामाजिक भी। फिर भी, यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि क्या हम जब चाहे तब, सत्याग्रह के लिए उपयुक्त, आत्मबल और नैतिक बल वाले लोगों की अपेक्षा पूरी कर सकते हैं? क्या कष्ट-सहन की पद्धति अपने में पर्याप्त है? दूसरी ओर, यह प्रश्न भी बना रहा है कि साधन की शुचिता के बगैर, क्या कोई ऊँचा साध्य साधा जा सकता है? संघर्षों के समाधान पर विचार करते हुए इस पुस्तक के लेखक, विख्यात गांधी-अध्येता, थॉमस वेबर ने आज की दुनिया में गांधी-दर्शन की व्यावहारिकता की एक गम्भीर पड़ताल की है। उनके इस विश्लेषण का हिन्दी में उपलब्ध होना एक स्वागतयोग्य घटना है।