जब समाज की चेतना पर शिकंजा कसा जाता है, तब सबसे पहले हमला विचारों, कला और अभिव्यक्ति पर होता है। लेकिन इतिहास गवाह है―हर अँधेरे दौर में कुछ आवाज़ें उठती हैं जो उम्मीद के चिराग़ जलाए रखती हैं। यह किताब सिर्फ़ कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि उन शब्दों का दस्तावेज़ है जो ख़ामोश रहने से इंकार करते हैं। इन कविताओं का जन्म भी ऐसे ही बेचैन समय में हुआ―उन घटनाओं के बीच जिन्होंने लेखक को क़लम उठाने पर मजबूर किया। यह संग्रह अन्याय, हिंसा, असमानता और दमन के विरुद्ध एक रचनात्मक प्रतिरोध है। यहाँ शब्द सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि संघर्ष की स्मृतियाँ, ग़ुस्से की आवाज़ और बेहतर भविष्य की कल्पनाएँ हैं। देश-दुनिया में चर्चित लेखक गौहर रज़ा ने यह किताब उस यक़ीन से लिखी है कि कविता की चोट कई बार बमों और गोलियों से भी गहरी होती है। क्योंकि एक कविता किताब के पन्नों से निकलकर सड़कों, गलियों और जनआंदोलनों की आवाज़ बन सकती है। यह संग्रह उन सभी लोगों को समर्पित है जो सबसे कठिन समय में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते―और जो मानते हैं कि प्रतिरोध सिर्फ़ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि इंसान बने रहने की शर्त है।